शफ़क़ की आख़िरी साँसों में
जब आसमान का दिल धड़कना
भूल जाता है,
मैं
देखता हूँ
फ़लक़
से टूटी हुई रौशनी
की धागे
धरती
की रगों में उतरने
से पहले
हवा
में उलझ कर ठहर
जाते हैं।
वहाँ
एक नक़्श है—
आधा
ख़्वाब, आधा ताबीर,
जिसके
साये में
मेरे
अशआर भी काँपते हैं,
मेरे
ख़याल भी थक कर
सज़दे
में गिर जाते हैं।
हर तरफ़ ख़ामोशी का
समुंदर है,
और उसके सीने पर
रूह
की नाव बह रही
है
बिना
पतवार, बिना मंज़िल।
मगर
इस बेनूर मंज़र में भी
एक जज़्बा चमकता है
उम्मीद
का वो दीया,
जिसे
न आँधियाँ बुझा पाती हैं,
न सदियाँ।
यक़ीन
जानो,
हवा
के इन पुलों पर
भी
कभी
तो उतरती है रहमत,
कभी
तो बरसता है नूर,
और वहीं
इंसान
अपनी तन्हाई का
अख़्तिमाम
लिखता है।
मुकेश
इलाहाबादी,,,
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