कई बार एहसास हुआ
जैसे मैं सदीयों से
इस हवा के पुल पर सफ़र कर रहा हूँ,
ना इस किनारे का हूँ,
ना उस पार का,
बस दरमियान ठहरा हुआ
इक अनजाना सफ़्हा,
जहाँ वजूद का हर हरफ़
ख़ामोशी में लिखता चला जाता है।
क़दम बढ़ते हैं मगर मंज़िल गुम है,
साँस चलती है मगर हमनवा नहीं।
हर लम्हा, जैसे ख़्वाब-ए-बे-ताब बनकर,
मेरी रूह की झिलमिलाहट में समा जाता है।
कभी लगता है
मैं कोई भटकी हुई रूह हूँ,
जो अज़ल से अबद तक
इक नामालूम इश्क़ की तलाश में
सिर्फ़ नूर-ए-फ़ना का ता़क़ुब करती फिरती है।
इस पार भी वीरानी,
उस पार भी तन्हाई,
और मैं
बस हवा के इस पुल पर
इंतज़ार-ए-अज़ल की दुआओं में गुम,
तेरी याद का आसरा थामे,
ख़्वाबों की तहों में उजाला खोजता जा रहा हूँ।
मुकेश इलाहाबादी,,,,,,,,,,,,,
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