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Sunday, 22 February 2026

सांसों की सर्द रुत

 सांसों की सर्द रुत

थमी-थमी सी फ़िज़ा, बेज़ुबान लम्हें,

लबों पे नाम तेरा, आँखों में तेरी सदा,

रात की पलकों से ढलके ख़्वाबों की बारिश,

तेरी याद की लिपटी हुई नर्म रिदा।


गुज़िश्ता पलों की कोई रौशन चिंगारी,

तेरे ख़त की तरह महकता हर इक किनारा,

सामने तू नहीं, मगर मौजूद हर जज़्बे में,

तेरी महफ़िल, तेरा रंग, तेरा ही इशारा।


गुनगुनाते साए, सिसकती चाँदनी,

तेरा नाम लरज़ता है ख़ामोश पत्तों पे,

शब की बाहों में जज़्ब हो गई तन्हाई,

तू कहीं है, मगर नहीं इन रातों पे।


उलझे जज़्बात, भीगे नर्म अल्फ़ाज़,

सर्द सांसों में तेरा ही एहसास बसा,

मैं तन्हा, मेरी तसवीर में तेरा नक़्श,

इश्क़ भी ठहर गया, जब तू न मिला।


मुकेश इलाहाबादी ------------------


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