फ़ुटपाथ पर पड़ी है इक ख़ाली कॉफ़ी का कप
और उसके अंदर भी
थोड़ा
सा रह गया है
इक बेनाम सा लम्हा
ख़ाली
बेंच पर
रिटेल
बोर्ड के नीचे
एक बुज़ुर्ग सा आदमी, वक़्त
के अख़बार में लपेट कर
ख़ुद
को पढ़ता मिलता है
ट्रैफ़िक
सिग्नल के एक गोशे
पर
एक बचपन फूल बेचता
है
और आँखों में किसी मुस्कुराहट
का स्केच छुपा है
फ़ोन
पर किसी की चीख़
कर आई आवाज़ —
"मैं
अब नहीं कर सकती!"
और उसके बाद
एक लंबा साँस ले
कर किसी लड़की ने
एक रिश्ता काट दिया होगा
एक वाक़िया, एक पल, एक
मोड़
शाम
का धुंधला गुलाबी झूठ बन जाता
है
और वक़्त
बस एक पुरानी डायरी
की तरह
हर किसी की जेब
में
मुड़ा-कुचला होकर पड़ा होता
है
मुकेश
इलाहाबादी -----------
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