होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Sunday, 22 February 2026

हवा में भटक कर आये विचार

 फ़ुटपाथ पर पड़ी है इक ख़ाली कॉफ़ी का कप

और उसके अंदर भी

थोड़ा सा रह गया है इक बेनाम सा लम्हा

 

ख़ाली बेंच पर

रिटेल बोर्ड के नीचे

एक बुज़ुर्ग सा आदमी, वक़्त के अख़बार में लपेट कर

ख़ुद को पढ़ता मिलता है

 

ट्रैफ़िक सिग्नल के एक गोशे पर

एक बचपन फूल बेचता है

और आँखों में किसी मुस्कुराहट का स्केच छुपा है

 

फ़ोन पर किसी की चीख़ कर आई आवाज़

"मैं अब नहीं कर सकती!"

और उसके बाद

एक लंबा साँस ले कर किसी लड़की ने

एक रिश्ता काट दिया होगा

 

एक वाक़िया, एक पल, एक मोड़

शाम का धुंधला गुलाबी झूठ बन जाता है

 

और वक़्त 

बस एक पुरानी डायरी की तरह

हर किसी की जेब में

मुड़ा-कुचला होकर पड़ा होता है

 

मुकेश इलाहाबादी -----------

No comments:

Post a Comment