रातें अब सपनों से नहीं, हिसाबों से भरी होती हैं
रातें अब सपनों से नहीं,
हिसाबों से भरी होती हैं।
हर पल का हिसाब रखा जाता है—
कितनी हँसी छोड़ी,
कितना ग़ुस्सा जमा किया,
कितने शब्द अधूरे रह गए।
चाँद बस निगरानी करता है,
तारों की चमक अब केवल गवाह है,
और हम गिनते हैं
पुरानी गलतियाँ, पुरानी यादें,
जैसे कोई बहीखाता पढ़ रहा हो।
नींद अब चोरी की तरह आती है,
हर ख्वाब के पीछे
एक अंक, एक संकेत, एक सवाल छिपा है।
रातें अब
सपनों के लिए नहीं,
सिर्फ़ हिसाब के लिए हैं—
हम अपने ही भीतर के लेखा-जोखा में उलझे हुए।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,
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