परात
रसोई के शांत कोने में
वह गोलाकार धातु की देह
परात,
जिसकी परिधि में
घर का चक्र घूमता था।
पीतल की चमक हो
या स्टील की सादगी,
उसका विस्तार
सिर्फ़ आटा गूँथने भर का नहीं,
गृहस्थी को आकार देने का था।
शोध बताता है—
गोलाई केवल आकार नहीं,
ऊर्जा का प्रतीक है;
जिस तरह पृथ्वी गोल है,
उसी तरह परात की थाली में
अन्न का ब्रह्मांड बसता है।
जब हथेलियाँ
आटे और जल को मिलाती थीं,
तो वह रसायन
केवल भोजन नहीं रचता था
वह श्रम, प्रेम और धैर्य का
संयोग रचता था।
परात की धातु
हाथों की ऊष्मा से गरम होती,
और उसमें
माँ की उँगलियों की लकीरें
अदृश्य इतिहास लिख जातीं।
विवाह के अवसर पर
मेहंदी भी इसी में घुलती,
हल्दी भी,
और कभी-कभी
मिष्ठान्न का अंबार भी
इसी गोल आकाश में सजता।
परात
एक सामूहिकता का पात्र थी
जहाँ बेटियाँ सीखतीं
गूँथना,
और बहुएँ
घर का स्पर्श पहचानतीं।
पर अब समय की धारा बदली है
रसोई से हटकर
वह एक औपचारिक वस्तु बनती जा रही है।
अक्सर दिखाई देती है
विवाह के अवसर पर,
सामान सजाकर देने के पात्र की तरह—
जहाँ उसका उपयोग
संस्कार से अधिक
प्रदर्शन में सिमट जाता है।
जो परात कभी
अन्न और स्नेह गूँथती थी,
वह अब
उपहारों का आधार बनकर
चुपचाप खड़ी रहती है
जैसे अपनी पुरानी भूमिका को
याद करती हुई।
रसोई में उसकी उपस्थिति कम हुई है,
पर स्मृतियों में
वह अब भी रखी है
थोड़ी-सी खरोंचों के साथ,
पर गरिमा में पूर्ण।
परात
सिर्फ़ एक बर्तन नहीं,
वह एक वृत्त है
जहाँ कभी अन्न, श्रम और स्नेह
एक ही लय में
गूँथे जाते थे।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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