पीकदान :
दरबारों और दालानों के कोनों में
चुपचाप रखा रहता था पीकदान
धातु की गोल देह,
ऊपर खुला मुख,
भीतर सिमटी हुई लाली का इतिहास।
यह वस्तु
सभ्यता के अनुशासन की गवाही है
जहाँ पान की रसभरी आदत
सड़क पर नहीं,
एक पात्र में उतरती थी।
जब पानदान खुलता था,
तो उसके साथ
पीकदान भी अपनी भूमिका निभाता
सौंदर्य और संयम
दोनों का संतुलन साधते हुए।
नवाबी तहज़ीब में
चाँदी या पीतल का पीकदान
शिष्टाचार का हिस्सा था;
थूक को भी
एक मर्यादा दी गई थी
कि रस बाहर आए,
पर असभ्यता नहीं।
शोध कहता है—
यह सार्वजनिक स्वच्छता की
प्रारंभिक समझ थी;
घरों और चौपालों में
पीकदान रखने की परंपरा
संकेत थी
कि आनंद और अनुशासन
साथ-साथ चल सकते हैं।
उसकी गोलाई में
लाल छींटों की परतें
सिर्फ़ पान की नहीं,
समय की परतें थीं
दरबार की चर्चाएँ,
आँगन की गोष्ठियाँ,
और धीमे-धीमे बीतती दोपहरें।
पर जब अनुशासन ढीला पड़ा,
तो पीकदान किनारों से हट गया,
और दीवारों ने
लाल धब्बों की भाषा सीख ली।
सभ्यता का पात्र
जब अनदेखा हो जाए,
तो सौंदर्य भी आहत होता है।
आज
पुराने घरों की अलमारियों में,
संग्रहालयों की काँच की अलमारियों में
या किसी राजवाड़े की धूल में
वह अब भी दिख जाता है
चमक खोए हुए,
पर गरिमा सँभाले हुए।
पीकदान
सिर्फ़ एक पात्र नहीं,
एक स्मरण है
कि आदतें चाहे कितनी भी गहरी हों,
उनके लिए भी
मर्यादा का स्थान होना चाहिए।
लाल रंग
यदि अनुशासन में रहे,
तो श्रृंगार है;
अनुशासन से बाहर निकले,
तो अव्यवस्था।
पीकदान
उसी महीन रेखा का नाम है
जहाँ स्वाद और सभ्यता
एक साथ संतुलित रहते हैं।
मुकेश ,,,,,,,,
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