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Saturday, 21 February 2026

अंगीठी

 अंगीठी 


सर्दियों की सुबह में

आँगन के बीच रखी अंगीठी

लोहे की गोल देह,

जालीदार साँसें,

और भीतर सुलगता हुआ ताप

मानो घर का छोटा-सा सूरज।


यह सिर्फ़ आग नहीं,

ऊष्मा का लोक-विज्ञान है

जहाँ ईंधन, वायु और धैर्य

मिलकर ताप का संतुलन रचते हैं।


बुरादे की अंगीठी

धीरे-धीरे सुलगती,

लकड़ी की महीन धूल में

समय की बचत छिपी होती है।

कम लौ, अधिक धीरज

जैसे कोई तपस्वी

राख के भीतर

अपना तेज़ साध रहा हो।


कोयले की अंगीठी

गहरी काली देह में

लाल अंगारों की आँखें,

ऊपर रखी केतली

धीमे-धीमे गुनगुनाती।

यह ऊष्मा स्थिर है,

लंबी साँस लेती हुई,

घर के हर कोने को

बराबर ताप देती हुई।


धीमे-धीमे सुलगती अंगीठी

उसमें लपट कम,

पर जीवन अधिक होता है।

रात भर

राख के नीचे बची चिनगारी

सुबह की रोटी का भरोसा है।


और फिर

तेज़ लौ से लपलपाती अंगीठी,

जब हवा ज़रा ज़्यादा मिल जाए

या कोयले का ढेर बढ़ जाए

ताप अचानक उग्र हो उठता है,

जैसे नियंत्रित विज्ञान

क्षण भर को

प्रकृति की स्वच्छंदता में बदल जाए।


अंगीठी

घर की सामाजिकता भी थी

उसके चारों ओर बैठकर

लोग हथेलियाँ सेंकते,

कहानियाँ सुनते,

मूँगफली फोड़ते,

और सर्दी की ठिठुरन

धीरे-धीरे पिघलती जाती।


शोध कहता है

अंगीठी की ऊष्मा

विकिरण और संवहन का संतुलन है;

पर लोक कहता है—

यह माँ की हथेली की गर्मी है,

जो राख में भी जीवित रहती है।


आज

हीटर और ब्लोअर की हवा में

अंगीठी कम दिखती है,

पर स्मृतियों में

वह अब भी धधकती है

धीरे-धीरे,

संयत,

जैसे कह रही हो

ऊष्मा केवल ताप नहीं,

साझा बैठने का कारण भी है।


मुकेश ,,,,,,,,,

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