होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Saturday, 21 February 2026

मिट्टी का चूल्हा

 मिट्टी का चूल्हा 


आँगन के कोने में

दो ईंटों और गीली मिट्टी से गढ़ा

वह चूल्हा

जैसे पृथ्वी का छोटा-सा हृदय,

जिसमें अग्नि धड़कती थी।


“घर-घर मिट्टी के चूल्हे”

कहावत यूँ ही नहीं बनी;

हर आँगन में

एक-सी लौ नहीं जलती थी,

हर घर की रोटी का स्वाद

उसकी अपनी मिट्टी से आता था।


चूल्हा

सिर्फ़ ईंधन का स्थान नहीं,

गृहस्थी का केंद्र था

जहाँ सुबह की पहली आँच

दिन की दिशा तय करती,

और शाम की अंतिम राख

थकान को विश्राम देती।


गाँवों की रसोई में

उपलों की गंध,

सूखी लकड़ियों की चटक,

और धुएँ की लकीर

छप्पर से उठकर

आकाश से बात करती थी।


शोध बताते हैं

मिट्टी के चूल्हे की धीमी आँच

भोजन को एक अलग गहराई देती है;

रोटी की सतह पर

सुलगन की जो महीन परत है,

वह केवल ताप नहीं,

समय का स्वाद है।


पर यह भी सच है

धुएँ ने आँखों को चुभन दी,

फेफड़ों में कालिख भरी;

इसलिए आधुनिक चूल्हों और गैस ने

स्वास्थ्य और सुविधा का

नया अध्याय खोला।


फिर भी

मिट्टी का चूल्हा

एक स्मृति है—

जहाँ दादी की हथेलियों की गर्मी,

माँ की फूँक की लय,

और बच्चों की भूख

एक साथ पकती थी।


“घर-घर मिट्टी के चूल्हे”

मतलब हर जीवन अलग है,

हर रोटी का ताप अलग,

हर घर की आग

अपनी परिस्थिति से जलती है।


आज

शहरों की चमकदार रसोइयों में

वह कम दिखाई देता है,

पर गाँव की पगडंडी पर

कहीं न कहीं

अब भी एक चूल्हा सुलगता है

जो याद दिलाता है

कि सभ्यता की असली लौ

मिट्टी से ही उठती है।


मुकेश ,,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment