जब किसी ने कहा — “यह मेरा है”
जब किसी ने कहा
“यह मेरा है,”
धरती ने कुछ नहीं कहा।
वह बस उतनी ही शांत रही
जितनी बीज बोते समय रहती है।
आकाश ने भी विरोध नहीं किया,
वह उसी तरह फैला रहा
बिना सीमाओं के,
बिना दीवारों के।
पर उस एक वाक्य ने
हवा की दिशा बदल दी।
रेत,
जो हर पाँव को समान रूप से थामती थी,
अचानक सवालों में बदल गई।
नदी,
जो दोनों किनारों को बराबर छूती थी,
रेखाओं में बाँट दी गई।
“यह मेरा है”
कहते ही
पेड़ों की छाँव छोटी हो गई,
क्षितिज संकुचित हो गया,
और पृथ्वी का गोलापन
मानो किसी मुट्ठी में सिमटने लगा।
किसी ने दावा किया
समुद्र पर,
जंगल पर,
पहाड़ पर।
पर क्या लहरें
किसी नाम से बंधती हैं?
क्या पर्वत
किसी दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करते हैं?
जब किसी ने कहा
“यह मेरा है,”
तो एक और आवाज़
धीमे से उठी—
“तुम भी तो मेरे हो।”
धरती का धैर्य
घोषणाओं से बड़ा है।
वह जानती है
जो आज कह रहा है “मेरा,”
कल उसी में समा जाएगा।
मालिकाना एक क्षण है;
मिट्टी शाश्वत।
और शायद
सबसे गहरी सच्चाई यही है
कि जिसे हम अपना कहते हैं,
वह हमें पहले ही
अपना बना चुका होता है।
जब किसी ने कहा
“यह मेरा है,”
तो समय मुस्कुराया
क्योंकि वह जानता है
कि अंततः
सब कुछ
किसी एक का नहीं,
सिर्फ़ होने का है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment