खोज की भाषा, सत्ता की व्याकरण
खोज की भाषा सरल होती है
“यह वहाँ है।”
“यह हमें मिला।”
“यह नया है।”
लेकिन सत्ता की व्याकरण
जटिल होती है
नाम बदलना,
सीमाएँ खींचना,
ध्वज गाड़ना,
और शोरगुल में इतिहास लिखना।
पहले कोई जमीन थी
तट, नदियाँ, जंगल।
फिर कोई नाव आई
और उसने कहा
“यह अब हमारी है।”
खोज की भाषा
निर्दोष, उत्सुक, उत्सवपूर्ण होती है।
पर सत्ता की व्याकरण
शर्तों और दावों से भरी होती है।
मसालों की गंध,
समुद्र की लहरें,
आकाश के तारे
वे सुनते रहे,
पर न बोले।
क्योंकि भाषा
वो थी जो मनुष्य समझ सके,
सत्ता
वो थी जो मनुष्य को डराए।
नक्शे बने,
समझौते हुए,
अनगिनत शब्दों में बयान हुए।
पर खोज के पल
सिर्फ़ क्षण भर के थे,
जैसे समुद्र का उठना और लौटना।
सत्य यह है
खोज कभी किसी का नहीं,
सिर्फ़ देखने वालों की होती है।
और सत्ता
देखने वालों को ही पकड़कर रखती है,
नामों और सीमाओं में बाँधकर।
आज भी
यदि ध्यान से सुनो,
तो हवाएँ फुसफुसाती हैं
खोज की भाषा है,
और धूप के झुरमुट में
सत्ता की व्याकरण।
वह कहती है
“जो तुमने पाया, वह तुम्हारा नहीं।
पर जो तुमने समझा, वह हमेशा तुम्हारा रहेगा।”
क्योंकि खोज
मनुष्य को दृष्टि देती है,
और सत्ता
मनुष्य को कहानी।
दोनों साथ चलते हैं
एक कहता है “देखो,”
दूसरा कहता है “यह मेरा।”
पर अंत में
धरती चुप रहती है
और केवल अपने नियमों में
सही और गलत को मापती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
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