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Tuesday, 24 February 2026

रूह का कोई दिशा-सूचक यंत्र नहीं होता।

 ज़िन्दगी के समंदर में

रूह का कोई दिशा-सूचक यंत्र नहीं होता।

लहरें आती हैं, ज्वार उठते हैं,

धुंध छा जाती है,

और हम केवल महसूस करते हैं।


नाव हो, जूता हो, ग्रंथ हो—

सब रास्ते दिखाने वाले साधन हैं,

लेकिन वास्तविक यात्रा

मन और आत्मा की अंतराल गहराई में होती है।


जहाँ तूफ़ान भी सिखाता है,

जहाँ मौन भी ज्ञान देता है,

और जहाँ हर अनुभव

हमें बिना नक्शे के

हमारे भीतर की दिशा खोजने को मजबूर करता है।


रूह अकेली चलती है,

कदम केवल साथी हैं,

और समंदर की गहराई

एक रहस्य बनकर हमारे भीतर उतरती है।


मुकेश ,,,,,,,,

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