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Sunday, 22 February 2026

जैसे शब्द ढूँढ़ लेते हैं अपना अर्थ

 मैं तुम्हें ऐसे प्रेम करता हूँ

जैसे शब्द ढूँढ़ लेते हैं अपना अर्थ


जैसे कोई भटका हुआ अक्षर

अचानक

किसी वाक्य में अपनी जगह पा ले,

और उसकी धड़कन

सार्थक हो उठे।


मैं तुम्हें ऐसे प्रेम करता हूँ

जैसे ध्वनि

अपने भीतर छिपे अर्थ की ओर

धीरे-धीरे बढ़ती है।


तुम मिलती हो

तो मेरे भीतर के

अनगिनत बिखरे हुए शब्द

सजने लगते हैं;

वाक्य बनने लगते हैं;

और जीवन

पढ़ा जाने योग्य हो उठता है।


जैसे कविता

अपनी अंतिम पंक्ति में

अचानक पूरी हो जाए,

वैसे ही

तुम्हारी उपस्थिति में

मेरी अधूरी व्याख्याएँ

पूर्णता पा लेती हैं।


मैं तुम्हें बाँधता नहीं

अर्थ भी शब्द को बाँधता नहीं;

बस उसे दिशा देता है,

गहराई देता है,

अस्तित्व देता है।


तुम्हारे साथ

मेरी खामोशियाँ भी

संकेत बन जाती हैं।

मेरी उलझनें

परिभाषा पा लेती हैं।


मैं तुम्हें ऐसे प्रेम करता हूँ

जैसे शब्द

लंबी भटकन के बाद

अपना अर्थ पहचान लेते हैं;

और फिर

दुनिया उन्हें

सुनने लगती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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