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Saturday, 21 February 2026

जैसे रेत सँभालती है दरिया के पदचिन्ह

 मैं तुमसे ऐसे प्रेम करता हूँ

जैसे रेत सँभालती है दरिया के पदचिन्ह


मैं तुम्हें थामता नहीं,

पर तुम्हारे गुजरने को

अपनी देह पर लिख लेता हूँ।


तुम आती हो

दरिया की चाल में,

भीगी, अनकही,

थोड़ी बेचैन,

थोड़ी गहरी

और मैं

रेत की तरह

बस फैल जाता हूँ।


तुम्हारे हर कदम का

हल्का-सा दबाव

मेरे भीतर

एक आकृति बना देता है।

न मैं तुम्हें रोकता हूँ,

न दिशा पूछता हूँ

बस तुम्हारे होने का

क्षण

अपनी खामोशी में सहेज लेता हूँ।


तुम लौट भी जाओ,

लहरें तुम्हारे निशान

मिटा भी दें

पर मेरे कणों की स्मृति में

तुम्हारी आहट

बहुत देर तक

नमी बनी रहती है।


मैं तुमसे ऐसे प्रेम करता हूँ

कि तुम्हारा आना

मेरे लिए उत्सव है,

और तुम्हारा जाना

विश्वास।


क्योंकि रेत जानती है

दरिया को बाँधना

उसकी प्रकृति नहीं,

पर उसके पदचिन्हों को

आदर से सँभाल लेना

उसका धर्म है।


मैं भी

तुम्हारे हर स्पर्श को

स्वामित्व नहीं,

स्मरण बनाकर

जीता हूँ।


मैं तुमसे ऐसे प्रेम करता हूँ

जैसे रेत

दरिया की थकान को

क्षण भर के लिए

अपनी गोद में

ठहरा लेती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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