तुम मुझसे ऐसे प्रेम करो
जैसे मछली करती है प्रेम लहरों से—
बिना शोर,
बिना घोषणा,
बस साँसों की सहज लय में।
जैसे जल ही उसका घर हो,
और लहरें
उसके हृदय की धड़कन।
वह लहरों से अलग नहीं रहती,
न उन्हें बाँधती है,
न थामती है—
बस उनके साथ
बहती है, मुड़ती है,
गहराई में उतरती है।
तुम भी
मेरे चारों ओर
ऐसे ही रहो
न बंधन बनकर,
न भय बनकर,
बस वह विस्तार
जिसमें मैं स्वयं को
पूर्ण महसूस कर सकूँ।
मछली
लहरों को छूती नहीं,
उन्हीं में जीती है।
उसका प्रेम
आसक्ति नहीं,
आश्रय है।
तुम मुझसे ऐसे प्रेम करो—
कि मेरी हर थकान
तुम्हारी उपस्थिति में
जल हो जाए;
और मैं
तुम्हारे साथ बहते हुए
अपने ही गहरे सागर तक पहुँच जाऊँ।
तुम मुझसे ऐसे प्रेम करो
जैसे मछली करती है प्रेम लहरों से—
स्वाभाविक,
अनिवार्य,
और जीवन के बिना
असंभव।
(शमशेर की एक कविता की पंक्ति से प्रेरित )
मुकेश ,,,,,,
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