झुमका
कान की लौ पर झूलता
एक छोटा-सा ग्रह,
जो देह की परिक्रमा में
ध्वनि और रोशनी का संतुलन साधता है।
यह आभूषण भर नहीं,
आकर्षण का सूक्ष्म यंत्र है
वृत्ताकार, लटकनयुक्त,
गति में ही पूर्ण।
भारतीय शिल्प-परंपरा में
कर्णाभूषण का इतिहास
मूर्ति-विज्ञान से भी पुराना है।
गुप्तकालीन प्रतिमाओं से लेकर
मध्यकालीन दरबारों तक,
कान की लय को
धातु ने आकार दिया।
बरेली
की गलियों में
पीतल और चाँदी की चमक
आज भी हथौड़े की थाप पर साँस लेती है।
और लोक-स्मृति गुनगुनाती है
झुमका गिरा रे,
जो मेरा साया की धुन से निकलकर
बाज़ार की धड़कन बन गई।
“झुमका गिरा रे, बरेली के बाज़ार में”
यह केवल पंक्ति नहीं,
लोक-आर्थिकी का सांस्कृतिक सूत्र है।
एक गिरा हुआ झुमका
पूरे शहर की पहचान बन गया
स्मृति और बाज़ार
एक-दूसरे में गुँथे हुए।
शोध कहता है,
लटकन का दोलन
चेहरे की रूप-रेखा को
गतिशील बनाता है।
चलते हुए झुमके की सूक्ष्म थिरकन
आँखों का ध्यान
गर्दन और गालों की ओर मोड़ती है
सौंदर्य का गणित
धातु की गति में छिपा है।
ध्वनि भी यहाँ महत्वपूर्ण है
हल्की खनक
मस्तिष्क के उस हिस्से को छूती है
जहाँ स्मृति और आकर्षण
एक साथ बसते हैं।
झुमका
स्त्री की चाल का अनुसंधान है,
वह चलता नहीं
चलन को अर्थ देता है।
जब वह गिरता है
किसी बाज़ार की भीड़ में,
तो केवल आभूषण नहीं खोता
एक कथा जन्म लेती है।
झुमका—
वृत्ताकार धातु का छोटा-सा शोधपत्र,
जिसमें सौंदर्य, ध्वनि,
अर्थशास्त्र और लोकगीत
एक ही लटकन में झूलते हैं।
और हर बार
जब कान के पास
वह हल्के से थरथराता है,
तो बरेली का वह बाज़ार
फिर से जीवित हो उठता है
चमक, भीड़, और
किसी गुम हुए झुमके की तलाश में।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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