“स्वप्न की नदी”
— मुकेश इलाहाबादी
सुनो,
कल्पना करो ,,
एक गोधूलि की धरती है,
जहाँ आसमान में धूप का बचा हुआ सुनहरा टुकड़ा
धीरे-धीरे पिघल रहा है।
नदी अपने किनारे से कुछ कहती है,
और पेड़ अपनी शाख़ों से जवाब देते हैं।
उस नदी के पार
एक छोटा-सा पुल है,
जिसके नीचे से जल नहीं,
बल्कि समय बहता है।
वहीं मैं खड़ा हूँ
और तुम,
सफ़ेद रेशमी ओढ़नी में
धीरे-धीरे मेरी ओर आती हो।
तुम्हारे बालों से हवा खेल रही है,
जैसे कोई अनजानी धुन की तान बजा रही हो।
तुम्हारे होंठों पर मुस्कान नहीं,
बस हल्की-सी उलझन है
कि ये सपना है या सच।
मैं कहता हूँ
“सपनों में मिलने वाले लोग
कभी ग़ायब नहीं होते,
वे बस नदी की तरह रूप बदल लेते हैं।”
तुम मुस्कुरा देती हो,
जैसे किसी बच्चे ने
पहली बार इंद्रधनुष छू लिया हो।
हम चलते हैं,
घास की कोमल ज़मीन पर —
जहाँ हर पत्ती तुम्हारे क़दमों से
एक कविता बन जाती है।
तुम ठहरती हो,
हवा में हाथ फैलाकर
कहती हो
“देखो, मैं हवा को पकड़ सकती हूँ!”
मैं देखता हूँ,
कि सच में हवा
तुम्हारे चारों ओर ठहर जाती है।
फिर तुम झुककर
पानी में अपने चेहरे को देखती हो,
और धीरे से पूछती हो
“क्या समय भी बूढ़ा होता है?”
मैं कहता हूँ
“नहीं,
बस यादें सफ़ेद हो जाती हैं।”
तुम हँस देती हो,
और तुम्हारी हँसी की लहर
नदी पर गिरती है
जैसे चाँदनी टूटकर बिखर गई हो।
रात अब उतर आई है,
हवा में बेला की महक है।
हम दोनों उस पुल के बीच खड़े हैं,
जहाँ से नीचे समय बहता है,
और ऊपर तारे देख रहे हैं।
तुम मेरा हाथ पकड़ती हो,
और कहती हो —
“अगर ये सपना है,
तो मैं इसमें हमेशा रहना चाहती हूँ।”
मैं कहता हूँ
“सपनों को छोड़ दो,
वो लौट आते हैं
जब याद उन्हें पुकारती है।”
तुम मेरे कंधे पर सिर रख देती हो
और कहती हो,
“तो फिर तुम मत लौटना।”
मैं कुछ नहीं कहता,
बस तुम्हारे बालों में
रात का एक तारा फँसा देता हूँ।
धीरे-धीरे सब कुछ मौन हो जाता है
नदी, हवा, आकाश,
यहाँ तक कि हम भी।
फिर अचानक
तुम्हारी हथेली की गर्मी
ठंडी होने लगती है।
तुम धुंध की तरह
मुझसे अलग होने लगती हो।
मैं कहता हूँ
“रुको...”
पर तुम हवा में घुल जाती हो।
नदी बहना नहीं रोकती,
बस उसका स्वर बदल जाता है
जैसे किसी ने प्रेम का
अंतिम सुर छेड़ दिया हो।
अब मैं अकेला हूँ
उस पुल पर,
जहाँ से समय गुजरता है,
जहाँ कभी तुम थी,
और अब बस
तुम्हारी खुशबू बची है।
मैं आसमान की ओर देखता हूँ,
जहाँ वही तारा चमक रहा है
जो मैंने तुम्हारे बालों में लगाया था।
शायद वह अब तुम्हारा नाम जानता है।
और मैं...
बस हर रात
उस नदी के किनारे जाकर
वही तारा ढूँढता हूँ
जो अब भी
मेरे सपनों में चमकता है।
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