"शून्य"
(सूफ़ी और दार्शनिक अंदाज़ में)
— मुकेश इलाहाबादी
शून्य —
जिसे सब डरते हैं,
पर वही तो सबका जन्मस्थल है।
तुम कहते हो — “कुछ नहीं।”
और मैं कहता हूँ —
“यही तो सब कुछ है।”
क्योंकि जो नहीं है,
वही तो मुक्त है —
रूप से, नाम से, देह से,
यहाँ तक कि खुद “होने” से भी।
शून्य में कोई आकृति नहीं,
पर उसी की गोद से आकृतियाँ जन्म लेती हैं।
जैसे मौन — जिससे संगीत निकले,
जैसे निःशब्दता — जहाँ से शब्द उगें।
शून्य वह आईना है
जिसमें ईश्वर खुद को देखता है —
और मुस्कुरा देता है।
मैंने जब खुद को मिटाया,
तो पाया —
मैं कभी था ही नहीं,
बस वही था — जो सबमें है।
कभी-कभी लगता है,
शून्य कोई स्थान नहीं,
बल्कि एक स्वभाव है —
जहाँ “मैं” और “तू” का अंतर
पिघल जाता है।
वहीं तो मिलन है —
जहाँ खोज खत्म नहीं होती,
बस खोजने वाला ही खो जाता है।
कबीर ने कहा था —
“ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया,”
और रूमी ने फुसफुसाया —
“Lose yourself completely,
so the Beloved may find you.”
शून्य वही दरवाज़ा है —
जहाँ भीतर जाने के लिए
पहले बाहर को छोड़ना पड़ता है।
और जब तुम भीतर पहुँचते हो,
तो कोई नहीं मिलता —
सिवाय तुम्हारे न-होने के।
वहीं —
एक गहरी, पारदर्शी रौशनी में
प्रेम खुद को पहचानता है,
और समय सिर झुका लेता है।
शून्य,
तू कुछ नहीं —
पर सब कुछ तेरे बिना अधूरा है।
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