शून्य
— मुकेश इलाहाबादी
शून्य — कोई खालीपन नहीं,
बल्कि सबका आरंभ है।
जहाँ कुछ नहीं दिखता,
वहीं से सब कुछ जन्म लेता है।
मौन की गोद में शब्द पनपते हैं,
न-होने में ही अस्तित्व खिलता है।
शून्य — ईश्वर का गुप्त नाम है,
जिसे उच्चारते ही “मैं” पिघल जाता है।
जो खुद को मिटा दे, वही उसे पा लेता है —
क्योंकि न-होने में ही होने का सत्य छिपा है।
शून्य न अंत है, न आरंभ —
बस प्रेम का अंतिम मौन है।
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