एक गदराई औरत के वक्ष
जैसे उषा की पहली आभा
क्षितिज पर धीरे-धीरे
पूर्ण होती हुई।
वे केवल देह के उभार नहीं,
ममता और माधुर्य की
दो उजली कलशियाँ हैं
जहाँ जीवन का प्रथम स्पर्श
आश्रय पाता है।
उनकी गोलाई में
चाँद की शीतलता भी है
और दोपहर की धूप की गरमी भी
काम और करुणा
एक साथ धड़कते हुए।
जब वह साँस लेती है,
तो वक्ष की लय में
एक अदृश्य तरंग उठती है
मानो समुद्र की गहराई
किनारे से संवाद कर रही हो।
उस वक्र में
आलिंगन का आश्वासन है,
प्यासे अधरों की चाह,
और वह कोमल आमंत्रण
जो शब्दों से नहीं,
स्पंदनों से पढ़ा जाता है।
पर उनमें उच्छृंखलता नहीं
एक सहज गरिमा है,
एक धैर्यपूर्ण आकर्षण,
जैसे प्रकृति स्वयं
अपने सौंदर्य पर
मुस्कुरा रही हो।
गदराए वक्षों में
सृष्टि का संगीत है
जहाँ सौंदर्य,
काम,
और जीवन
एक ही लय में
धीरे-धीरे धड़कते हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment