होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Saturday, 21 February 2026

एक गदराई औरत की जाँघें


एक गदराई औरत की जाँघें

मानो दो शांत स्तंभ

जिन पर टिका हो

चलते समय का सारा संगीत।


उनमें

धूप की पकी हुई गरमी है,

धान की बालियों-सी नरमी,

और किसी पहाड़ी पगडंडी का

धीमा, भरोसेमंद उतार।


जब वह चलती है,

तो कदमों के बीच

एक अदृश्य लय जन्म लेती है

जाँघों की सहज थिरकन में

धरती की गहराई बोलती है।


उनका स्पर्श कल्पना में ही

रेशमी दोपहर-सा फैल जाता है

जहाँ काम

अधीर नहीं,

धीमे-धीमे पकता हुआ

रस बनता है।


वह उभार

न कोई प्रदर्शन है,

न चंचलता

वह तो प्रकृति का आत्मविश्वास है,

पूर्णता का निडर वक्र।


उन जाँघों में

आलिंगन की संभावनाएँ हैं,

गर्म साँसों की छाया,

और वह मौन निमंत्रण

जो शब्दों से नहीं,

धड़कनों से पढ़ा जाता है।


गदराई जाँघें

देह की भाषा का

सबसे गाढ़ा अक्षर हैं

जहाँ सौंदर्य और काम

एक-दूसरे में घुलकर

सिर्फ़ जीवन बन जाते हैं।


मुकेश ,,,,,,,

No comments:

Post a Comment