गदराई स्त्री के नितंब
वह जब मुड़ती है
तो जैसे ऋतु बदलती है।
धरती की थकी हुई साँसों में
एक गुप्त स्पंदन जागता है।
उसके नितंब
सिर्फ़ देह का उभार नहीं,
वे तो सृष्टि की पूर्णता का
मौन उत्सव हैं
जहाँ वक्रता
लज्जा से नहीं,
गर्व से जन्म लेती है।
उनमें
आम्र-बौर की गंध है,
सावन की भीगी हरियाली,
और किसी अनाम नदी का
धीमा, गाढ़ा मोड़
जो बहते हुए भी
रुक-रुक कर
स्वयं को महसूस करता है।
जब वह चलती है
तो वस्त्रों की तहों में
काम की अग्नि
धूप की तरह धधकती है—
धीमी, सुगंधित,
पर भीतर तक उतर जाने वाली।
उस वक्र में
अधरों की प्यास छिपी है,
आलिंगन की संभावनाएँ,
और वह गहन आमंत्रण
जिसे शब्द नहीं,
सिर्फ़ त्वचा पढ़ती है।
पर यह काम
उच्छृंखल नहीं
यह तो वही आदिम शक्ति है
जिसने
बीज को अंकुर बनाया,
अंकुर को वृक्ष,
और वृक्ष को
फलों से भर दिया।
गदराए नितंबों में
धरती का आश्वासन है
कि सौंदर्य
केवल देखा नहीं जाता,
जीया जाता है।
और काम
जब रस में डूबा हो,
तो पाप नहीं,
सृष्टि का उत्सव बन जाता है।
मुकेश ,,,,,,,
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