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Saturday, 21 February 2026

एक गदराई औरत की कमर

 एक गदराई औरत की कमर


एक गदराई औरत की कमर

जैसे सावन की पहली बेल

भीगी मिट्टी से उठती हुई

धीरे–धीरे लिपटती

किसी अनदेखे सपने से।


उसकी कमर

न तो केवल देह का वक्र है,

न मात्र रेखा,

वह तो लय है,

किसी अनकहे गीत की।


जब वह चलती है

तो हवा उसके इर्द-गिर्द

घुँघरू बाँध लेती है,

और ज़मीन

अपने कठोरपन को

क्षण भर के लिए भूल जाती है।


उस वक्र में

धरती का धैर्य है,

नदी की मंथर चाल,

और चाँद की अधूरी गोलाई

जो पूर्ण होकर भी

थोड़ी सी शरमाती रहती है।


उसकी कमर

किसी कवि की पहली हिचक है,

किसी चित्रकार की थरथराती रेखा,

किसी शायर का

वो मिसरा

जिसे लिखते हुए

स्याही भी मुस्कुरा उठे।


न उसमें उच्छृंखलता है,

न कोई शोर

बस एक आमंत्रण है

सौंदर्य को समझने का,

रस को महसूस करने का,

और यह जानने का

कि देह भी

जब सहज होती है

तो दर्शन बन जाती है।


एक गदराई औरत की कमर

समय के पृष्ठ पर

लिखी हुई वह इबारत है

जिसे पढ़ते हुए

मन ठहर जाए

और आँखें

प्रार्थना बन जाएँ।


मुकेश ,,,,,,,,

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