ढिबरी
मिट्टी या पीतल की छोटी-सी देह,
तेल में भीगी सूती बाती
ढिबरी,
रात के विस्तृत अँधेरे में
एक बिंदु-भर प्रकाश।
वह दीपक से भी साधारण,
लालटेन से भी विनम्र
पर अपने सीमित घेरे में
पूर्ण विश्व रच देने वाली।
शोध बताता है
ढिबरी का विज्ञान
सरल पर सटीक है;
तेल की केशिकीय गति से
बाती में चढ़ता ईंधन,
और लौ का नियंत्रित कंपन
ऊर्जा का लघु-सिद्धांत।
गाँव की कच्ची दीवारों पर
उसकी छाया
अक्षरों की तरह थरथराती;
बच्चा उसी रोशनी में
पहला शब्द लिखता,
माँ उसी में
सूई में धागा पिरोती।
ढिबरी
तेज़ उजाले का दावा नहीं करती थी;
वह कहती थी—
“जितना आवश्यक है,
उतना ही पर्याप्त है।”
उसकी लौ
धीरे-धीरे कालिख रचती,
और काली छत पर
धुएँ का इतिहास लिख जाती
जैसे हर छोटी वस्तु
अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है।
आँधी में वह
तुरंत बुझ भी जाती,
पर फिर से जलाना कठिन न था
थोड़ा तेल,
थोड़ी सावधानी,
और धैर्य का स्पर्श।
अब उजाला
बटन की आज्ञा से आता है,
और ढिबरी
संदूक के किसी कोने में
भूली पड़ी है।
पर उसकी स्मृति में
सादगी का उजास है
जहाँ प्रकाश
आडंबर नहीं,
आवश्यकता था।
ढिबरी
सिर्फ़ एक छोटा दीप नहीं,
वह याद है
कि अँधेरे को हराने के लिए
कभी-कभी
एक बिंदु ही काफ़ी होता है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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