लालटेन
अँधेरी रात के सीने में
काँच की देह में थरथराती लौ
लालटेन,
जो रोशनी से अधिक
विश्वास का पात्र थी।
मिट्टी के तेल की गंध,
लोहे का ढाँचा,
और भीतर जली छोटी-सी बत्ती
उसकी संरचना
सरल विज्ञान का जीवित उदाहरण थी;
ऑक्सीजन, ईंधन और बाती का संतुलन,
और अँधेरे पर
धीमी विजय।
शोध बताता है
लालटेन की काँच-चिमनी
सिर्फ़ आवरण नहीं,
वायु-प्रवाह का नियमन है;
लौ को काँपने से बचाने का उपाय,
ताकि प्रकाश स्थिर रहे।
गाँव की पगडंडी पर
जब वह हाथ में उठती,
तो रास्ता ही नहीं,
मन भी उजला हो जाता।
स्कूल की कॉपी पर झुका बच्चा,
खेत से लौटता किसान,
और आँगन में बैठी दादी
सबकी साँझ
उसी रोशनी में सिमटती।
लालटेन
बिजली के अभाव की कहानी नहीं,
धैर्य की कहानी है;
जहाँ रोशनी तेज़ नहीं,
पर निरंतर होती थी।
तूफ़ान में
उसकी लौ काँपती अवश्य थी,
पर बुझने से पहले
संघर्ष करती थी
मानो सिखाती हो
कि प्रकाश का अर्थ
चमक नहीं, टिके रहना है।
रेलवे प्लेटफ़ॉर्मों पर
संकेत की तरह,
और चौकीदार के हाथ में
रात्रि-पहरे की आँख बनकर
वह चलती थी
जिम्मेदारी का प्रतीक।
अब स्विच दबाते ही
चमक फैल जाती है;
लालटेन
दीवारों से उतरकर
संग्रह की वस्तु बन रही है।
पर उसकी काँच पर जमी कालिख में
इतिहास की परत है
जिसे पोंछो तो
पुरानी रातें चमक उठती हैं।
लालटेन
सिर्फ़ एक प्रकाश-यंत्र नहीं,
अँधेरे से संवाद का माध्यम है
जहाँ छोटी-सी लौ
पूरा घर संभाल लेती थी।
मुकेश ,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment