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Saturday, 21 February 2026

सूप ,

 सूप ,

धान की महक से भरे आँगन में

एक बाँस का अर्धचंद्र

सूप,

जिसकी झिलमिल बुनावट में

गाँव की धड़कन बसती थी।


वह केवल टोकरी नहीं,

हवा और हाथ का विज्ञान था;

अनाज और भूसी के बीच

सूक्ष्म भेद की पहचान था।


शोध कहता है

सूप की आकृति

वायुगति का लोकज्ञान है;

हल्का उड़े,

भारी ठहरे

प्रकृति का नियम

हथेलियों की लय में उतर आता था।


जब स्त्रियाँ

साँझ की रोशनी में

धान फटकती थीं,

तो सूप की थाप

एक संगीत रचती—

“सत् अलग, असत् अलग”

जैसे जीवन का पाठ पढ़ाती हो।


भूसी उड़कर

आकाश में धूल-सा तिरती,

और दाने

नीचे गिरकर

अपना वजन सिद्ध करते।

सूप

केवल अन्न नहीं छानता था,

वह अनुभवों को भी

परखता था।


कहावतों में भी

उसका रूपक जीवित है

जो सूप है

वह सार रखे,

जो चलनी है

वह छेद गिने;

लोक ने वस्तुओं से

नीति सीखी।


बाँस की पतली पट्टियाँ

धैर्य से गुँथी होतीं,

जैसे परिवार की एकता;

टूटी तो सुधारी जातीं,

फेंकी नहीं जाती थीं

क्योंकि उसमें श्रम की गरिमा थी।


अब मशीनें

एक बटन में

छँटाई कर देती हैं;

धूल अलग, दाना अलग

पर हाथों की वह लय

कहाँ सुनाई देती है?


सूप

धीरे-धीरे

रसोई और खलिहान से

गायब होता जा रहा है,

पर लोकगीतों और कहावतों में

अब भी झलकता है

एक प्रतीक बनकर।


वह याद दिलाता है

जीवन भी सूप है;

हवा के झोंकों में

हल्कापन उड़ जाता है,

और जो ठहरता है

वही सार है।


सूप

सिर्फ़ एक उपकरण नहीं,

वह विवेक की थाप है

जहाँ अनाज ही नहीं,

मन भी

फटककर शुद्ध होता था।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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