ख़ुद को खो देने की सीमा से आगे भी कुछ होता है
कभी लगता है
मैंने सिर्फ़ निभाने के लिए जिया
किसी की उम्मीदों का बोझ
कंधों पर बाँधकर,
अपने सपनों को कोठरी में बंद कर दिया।
हर चुप्पी को सहकर सोचा
"अब और नहीं…"
पर सहना भी लत की तरह है,
और ये लत धीरे-धीरे
मुझसे मेरा ही चेहरा छीन लेती है।
फिर एक दिन
अपनी ही हँसी पर शक होने लगता है
क्या ये सचमुच मेरी है,
या बस किसी और को भरोसा दिलाने की आदत?
ख़ुद को खो देने की सीमा से आगे
एक टूटा हुआ आदमी खड़ा होता है।
उसके पास आँसू नहीं,
सिर्फ़ एक गाढ़ी थकान होती है
जो कहती है:
"अब मुझे चाहिए—मैं खुद।"
और तभी
शुरू होता है उसका नया जन्म
बिना किसी तालियों के,
बिना किसी साक्षी के,
सिर्फ़ भीतर की सन्नाटे में।
मुकेश ,,,,,,,
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