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Sunday, 22 February 2026

हम नहीं बने थे बचने के लिए

 "हम नहीं बने थे बचने के लिए"


हम पत्थर नहीं थे,

ना ही चाँद थे,

ना फूल, ना बीज,

ना ही वे चीज़ें

जिन्हें बनाकर ब्रह्मांड को

अपने पर गर्व हुआ हो।

हम बने थे 

किसी संकोच से।

किसी क्षमा के प्रयास में

गलती से निकली एक साँस जैसे।

हम आए थे

पृथ्वी को पूरा करने नहीं,

बल्कि उसके संतुलन को

थोड़ा और अस्थिर करने।

हम में प्रेम था 

लेकिन ग़लत दिशा में।

हमने चाहा जिन्हें,

उनका अस्तित्व

हमारे अंत के लिए

ज़रूरी था।

हमने शहर चुने 

जिनमें धूल ही धर्म थी,

हमने मित्र चुने 

जो हमारी आत्मा की गिरवी पर बने थे,

और देवता 

जिन्हें हमने अपने अंधेपन से गढ़ा था।

हम हारे, टूटे, डूबे —

और तब जाकर

हमें यह बोध हुआ 

कि यह विफलता ही

हमारा पूर्णतम रूप थी।

हम नहीं बने थे बचने के लिए।

हम बने थे

एक सुंदर, संपूर्ण

विनाश की कथा कहने के लिए।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

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