अकेलेपन की एक गंभीर आज़ाद नज़्म
अकेलापन
किसी खाली कमरे की तरह नहीं होता,
बल्कि उन भरे कमरों जैसा होता है
जहाँ सब हैं—पर कोई नहीं।
कभी वह एक चुप घड़ी में
दीवार पर चलती सुइयों की आवाज़ बन जाता है,
तो कभी नींद के बीच
एक सवाल बनकर जाग उठता है
"क्यों अब तक कोई लौटकर नहीं आया?"
अकेलापन वो जंग नहीं
जिसमें तुम लड़ते हो,
बल्कि वो समझौता है
जो तुम अपनी परछाई से कर लेते हो
हर शाम… हर सुबह।
और फिर एक दिन
तुम्हें उसकी आदत हो जाती है
जैसे किसी पुराने ज़ख्म की
दर्द रहित स्मृति।
सबसे बुरा यह नहीं
कि तुम अकेले हो,
सबसे बुरा यह है
कि अब तुम
किसी के होने की उम्मीद भी नहीं रखते।
और सबसे भयानक होता है
जब यह सब समझ में आता है
बहुत देर से।
इतनी देर कि अब
कोई भी आ जाए…
फर्क ही नहीं पड़ता।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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