अकेले न रह पाने का दर्द
(भीतर की एक चुप पुकार)
कभी सोचा है,
क्यों नहीं रह पाते हम अकेले?
क्यों हर ख़ामोशी
सीटी बजाती है कानों में,
और हर सूनी रात
जैसे चीख़ बन जाती है दिल के भीतर?
अकेले न रह पाने का दर्द
कोई सामान्य कमजोरी नहीं है
यह उस दिल की पुकार है
जो बार-बार टूटा,
पर हर बार किसी सहारे की उम्मीद में
जुड़ने की कोशिश करता रहा।
जब कोई साथ नहीं होता,
तो मन अपने ही सवालों से घिर जाता है
"क्या मैं पर्याप्त हूँ?"
"क्या मेरी ख़ामोशी भी किसी को सुनाई दे सकती है?"
और इन सवालों की गूंज
अक्सर सांसों को बोझ बना देती है।
अकेले न रह पाना
भीतर की अधूरी कहानियों का बोझ है,
वो रिश्ते जो आधे रह गए,
वो बातें जो कभी कह नहीं पाए
सब मिलकर
एक भीड़ बन जाते हैं भीतर…
जो हमें ख़ुद से भी अलग कर देती है।
हम हर आवाज़ में अपनापन खोजते हैं,
हर छूने में भरोसा,
और हर मुस्कान में एक ठिकाना…
क्योंकि अकेले रहना
हमें हमारे सबसे सच्चे चेहरे से मिलाता है
जिससे मिलना
हमने कबका छोड़ दिया।
अकेले न रह पाने का दर्द
वास्तव में,
ख़ुद से दूर हो जाने का डर है।
और जब तक
हम उस डर को सहला नहीं लेते—
हम भीड़ में भी अकेले नहीं,
बल्कि खुद से बिछड़े हुए रहते हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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