एक नज़्म उन मर्दों के नाम जो चुप रहते हैं
वो मर्द...
महज़ मर्द नहीं थे,
बल्कि सदियों के मलबे से उठे हुए
कुछ आधे-अधूरे मक़बरे थे
जिनमें मोहब्बत भी दफ़्न थी,
और मज़बूरी भी।
कुछ कुछ वैसे जैसे किसी टूटे हुक्के का
आख़िरी कश हो
जिसमें ना धुआँ हो,
ना तलब,
सिर्फ़ आदत का कड़वापन बचा रह गया हो।
वो मर्द...
जिनके काँधे पे रिवायतों की रक़म रखी गई थी,
और जिनके लबों पे
‘सब ठीक है’ का फाहा बाँध दिया गया था।
कुछ ऐसे जैसे किसी बजरे पे चढ़ा नाविक,
जो हर तूफ़ान से कहता है —
“मैं ठीक हूँ…”,
मगर उसकी आँखों में
चुपके से एक खारे पानी की लकीर
हर रोज़ उतरती है।
उन मर्दों ने
अपने भीतर एक दीवार खड़ी की थी,
जिसके इस तरफ़
फ़र्ज़ों की फौज थी
और उस तरफ़
कोई अधजली मोहब्बत।
वो मर्द
जो रोज़ दफ़्तर की फ़ाइलों में
अपनी हसरतें मोड़कर रखते रहे,
जैसे ख़त जो कभी भेजे नहीं गए
मगर हर लफ़्ज़ में किसी महबूब का नाम छुपा था।
कुछ मर्द ऐसे थे
जो बच्चे के लिए सुपरहीरो थे
बीवी के लिए कन्धा
और माँ के लिए
अख़बार लाने वाला एक सिपाही।
मगर अपने लिए?
बस एक ख़ाली अलमारी का सबसे ऊपर का खाना —
जहाँ कोई भी नहीं देखता
और जहाँ वो ख़ुद को छुपा देते हैं।
जब उनका हमसफ़र चला गया
जिसे वो मर्द होकर भी
‘मेरी जान’ कहते थे कभी
तो उन्होंने बिखरी चूड़ियों को
काग़ज़ की नाव में रखकर
उस नदी में बहा दिया
जिसका नाम उन्होंने कभी नहीं बताया।
उनकी मोहब्बत
कभी ग़ज़ल नहीं बनी,
कभी डायरी में दर्ज नहीं हुई
बस रोटियों के बीच दबी रही
जैसे सिक्के पुराने वक़्त के,
जिन्हें चलन से बाहर कर दिया गया हो।
एक दिन उन्होंने भी
दीवार पे उँगली से लिखा
ख़ामोशी = दर्द
दर्द = वजूद
वजूद = न दिखाई देने वाली चीख़
और फिर उसी उँगली को
चूम लिया चुपचाप,
जैसे कोई वक़्त से
अपनी पहचान माँग रहा हो।
साँस रोके
इश्फ़ाक़ नाम का एक बुज़ुर्ग
जिसका नाम कभी फ़ैज़ की किसी तहरीर में आया था —
अपनी झुकी कमर और काँपते हाथों से
कहता है...
"हम वो मर्द थे...
जिन्हें कभी रोने की इजाज़त नहीं थी
मगर हम रोए —
अंदर ही अंदर,
जैसे रात रोती है
सुबह से पहले..."
(यह नज़्म हर उस मर्द के नाम,
जिसकी तन्हाई कभी नहीं सुनी गई।)
मुकेश इलाहाबादी --------------
No comments:
Post a Comment