इत्रदान
सिर्फ़ शीशी नहीं,
स्मृति का पारदर्शी पात्र है,
जिसमें बंद रहती है
किसी मौसम की गुप्त धड़कन।
कहा जाता है
कि सुगंध का पहला प्रयोग
राजदरबारों में नहीं,
मिट्टी की कोख में हुआ—
जब पहली वर्षा ने
सूखी धरती को चूमा
और उठी वह गंध
जिसे हमने सोंधी कहा।
इत्रदान उसी सोंधी स्मृति का
सभ्य रूप है।
कभी
नूरजहाँ
ने गुलाब की पंखुड़ियों से
उठती भाप में
प्रेम का रहस्य खोजा था—
और तब से
अत्तर सिर्फ़ सजावट नहीं,
संवाद बन गया।
कन्नौज
की गलियों में
आज भी तांबे की देगों में
समय पकता है,
और भाप की पतली नसों से
रूह-ए-गुलाब टपकती है—
इत्रदान की काँच-सी देह में
धीरे-धीरे भरती हुई।
शोध कहता है
गंध सीधे स्मृति से बात करती है,
मस्तिष्क के उस कोमल हिस्से से
जहाँ तर्क नहीं,
अनुभव बसते हैं।
इसलिए
इत्रदान खोलते ही
कभी दादी का आँगन,
कभी किसी प्रेम-पत्र की तह
अचानक जीवित हो उठती है।
पर इत्रदान का विज्ञान
सिर्फ़ रसायन नहीं
यह आसवन है,
संयम है,
समय को भाप में बदलने की कला है।
एक बूंद के पीछे
सैकड़ों पंखुड़ियों का समर्पण,
और धैर्य का लंबा तप।
इत्रदान
हथेली में थमा
एक छोटा-सा ब्रह्मांड है—
जहाँ सुगंध
दृश्य से अदृश्य की यात्रा करती है।
जब कोई
कलाई पर एक बूँद रखता है,
तो वह सिर्फ़ महक नहीं पहनता
वह इतिहास,
रसायन,
और स्मृति का संगम
अपने साथ ले चलता है।
इत्रदान
दरअसल
सुगंध का शोध-पत्र है,
जो काँच की चुप्पी में
लिखा गया है;
और हर बार खुलते ही
हवा में पढ़ा जाता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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