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Wednesday, 18 February 2026

वो तुम्हारा खिलखिलाना और अनारदानों का बिखरना

 वो तुम्हारा खिलखिलाना

अचानक, बेइख़्तियार,

जैसे सूनी दोपहर में

किसी ने धूप की मुट्ठी उछाल दी हो।


हँसी तुम्हारे होंठों से निकलती

और हवा में फैल जाती

हल्की, चमकीली,

जैसे किसी अनार को चीरकर

लाल दाने आकाश में बिखेर दिए हों।


मैंने कई बार सोचा है,

हँसी भी क्या फल होती है?

जिसे ज़रा-सा छुओ

तो भीतर छुपी मिठास

दिखने लगती है।


तुम्हारे खिलखिलाने में

कोई बनावट नहीं थी

बस एक खुलापन,

जैसे हथेलियाँ

बिना डर के फैल गई हों।


अनारदानों का बिखरना

मुझे हमेशा तुम्हारी याद दिलाता है—

छोटे-छोटे लाल चमकते कण,

जो ज़मीन पर गिरकर भी

अपना रंग नहीं छोड़ते।


तुम हँसती थीं

तो लगता था

दुनिया की सख़्ती थोड़ी कम हो गई;

जैसे किसी सर्द मौसम में

अचानक गरम चाय की भाप उठे।


अब जब तुम पास नहीं,

तब भी कभी-कभी

वही खिलखिलाहट

याद की तरह लौट आती है

धीमे से,

बिना दस्तक दिए।


और मैं सोचता हूँ,

अनार के दाने भले बिखर जाएँ,

उनकी मिठास

हथेली पर रह ही जाती है।


वो तुम्हारा हँसना

शायद एक पल था,

पर उसका रंग

आज तक नहीं फीका पड़ा

जैसे किसी ने

दिल की ज़मीन पर

अनारदानों-सा लाल उजाला

हमेशा के लिए छिड़क दिया हो।


मुकेश ,,,,

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