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Monday, 23 February 2026

बारिश में ख़त

 बारिश में ख़त

तेरे नाम लिखा ख़त भीग गया,

स्याही धुली — पर दर्द और गहरा गया।

बारिश ने छू लिया उसे धीरे-धीरे,

जैसे मेरी तन्हाई को महसूस कर रही हो।


बूँदें गिरीं, और हर एक ने कहा,

“इश्क़ को काग़ज़ पे नहीं, रूह में लिखना चाहिए।”

पर मैं फिर भी लिखता रहा,

हर अक्षर में तेरा नाम, हर शब्द में यादें।


हवा भी साथ थी — कानों में फुसफुसाई,

“ये अधूरी चाहत, ये बेमोल तड़प,

सिर्फ़ बरसात में ही पूरी होती है।”

और मैं खड़ा रहा उस खिड़की के पास,

तुम्हारी तस्वीर आँखों के सामने,

और बारिश की हर बूँद में तुम्हें ढूँढता रहा।


ख़त धुला, स्याही उड़ गई,

पर मेरी तन्हाई ने उसे गले लगा लिया।

हर भीगी पन्नी मेरे जज़्बातों का दर्पण बन गई,

हर शब्द बूँदों में घुलकर,

मेरी आत्मा के अंदर उतर गया।


बारिश ने मुस्कुराते हुए कहा,

“जो लिख दिया गया है, वह सिर्फ़ तुम्हारे लिए है,

और जो नहीं लिखा, वह रूह में हमेशा तैरता रहेगा।”

और मैं खड़ा रहा,

भीगते हुए, लेकिन मुक्त हुए दिल के साथ,

सुन रहा था उसकी अनकही दास्तान,

जो हर बार मेरी यादों के साथ लौट आती है।


तुम नहीं हो यहाँ, पर तुम्हारी खुशबू,

बारिश की हर बूँद में, हवाओं में,

और इस भीगे ख़त में हमेशा जीवित रहेगी।

और मैं जानता हूँ —

इश्क़ को काग़ज़ पे नहीं, रूह में लिखा जाता है,

और बारिश उसे याद दिलाती रहती है।


मुकेश ,,,,,,,,,

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