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Monday, 23 February 2026

चलो, आज कुछ देर चुपचाप बैठते हैं

 चलो, आज कुछ देर चुपचाप बैठते हैं

चलो,

आज कुछ देर

चुपचाप बैठते हैं 

बिना कुछ कहे, बिना कुछ सुने,

बस एक-दूसरे के होने को महसूस करते हैं।


कितनी बातें हैं

जो शब्दों से नहीं कही जा सकतीं,

कितने जज़्बात हैं

जो सिर्फ़ निगाहों की ठहरन में समझे जा सकते हैं।


शब्द तो शोर हैं,

कभी ज़रूरत, कभी छलावा,

पर मौन —

मौन तो सच्चा दर्पण है,

जो दिल की धड़कनों का अर्थ बता देता है।


चलो,

आज कोई सवाल नहीं करेंगे,

न कोई शिकायत,

न कोई “क्यों” या “कब।”

बस समय को थाम लें,

जैसे हवा में कोई नम सी धुन तैर रही हो।


शायद इसी चुप्पी में

हम फिर से एक-दूसरे को सुन पाएँ 

बिना आवाज़ के,

बिना उम्मीद के,

सिर्फ़ अहसास के सहारे।


क्योंकि प्रेम का सबसे सच्चा रूप

शब्दों में नहीं,

इस खामोशी में छिपा होता है,

जहाँ दो आत्माएँ एक मौन में मिलती हैं,

और सृष्टि कुछ पल के लिए ठहर जाती है।


चलो,

आज कुछ देर

चुपचाप बैठते हैं 

तुम अपनी आँखों में कहानी रखो,

मैं अपनी सांसों में संगीत,

और इस मौन में

हम फिर से "हम" बन जाएँ।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,

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