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Monday, 23 February 2026

सूखा हुआ पेड़ और ज़मीन पे गिरे पत्ते

 सूखा हुआ पेड़ और ज़मीन पे गिरे पत्ते


सूखा हुआ पेड़ खड़ा था

जैसे किसी बूढ़े दरवेश की तरह,

जिसने मौसमों से बहस करना छोड़ दिया हो।


उसकी शाख़ों पर

अब हरियाली की दुआ नहीं,

बस ख़ामोश आसमान टंगा था।


ज़मीन पर गिरे पत्ते

पीले ख़तों की तरह बिखरे थे

हर एक में गुज़रे वक़्त की सरगोशी।


हवा जब गुज़रती,

तो वो पत्ते यूँ खड़खड़ाते,

मानो अपनी जुदाई का बयान पढ़ रहे हों।


पेड़ उन्हें देखता रहा

बिना अफ़सोस, बिना पुकार,

जैसे जानता हो कि गिरना भी क़ुदरत का फ़ैसला है।


ये रिश्ता अजीब था

एक खड़ा रहा,

दूसरे बिछड़ कर भी उसी के क़रीब रहे।


सूखेपन में भी

एक तरह की रवानगी थी

कि जो गिरा है, वही मिट्टी बनकर

फिर किसी सुबह की हरियाली लिखेगा।


मुकेश ,,,,,,,

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