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Monday, 23 February 2026

रेत के समंदर में औंधी पड़ी नाव

 रेत के समंदर में औंधी पड़ी नाव


रेत का समंदर था—

लहरें नहीं, बस हवा की उँगलियाँ

जो धूल को लहरों-सा उठाती थीं।


और वहाँ,

औंधी पड़ी एक नाव

जैसे किसी ख़्वाब का कश्ती-सा बदन

वक़्त की पीठ पर उलट गया हो।


कभी इसी में

पानी की महक बसती होगी,

चप्पुओं की थकान,

और किनारों की उम्मीद।


अब उसकी लकड़ी में

दरारों का इतिहास है,

और सन्नाटे की कीलें

गहरे धँसी हुई हैं।


रेत उसे ढाँपती रहती है,

जैसे कोई पुराना राज़

धीरे-धीरे दफ़्न किया जा रहा हो।


वो नाव अब चल नहीं सकती,

मगर उसके भीतर

अब भी एक समंदर धड़कता है।


शायद किसी दिन

बारिश लौटे,

और रेत फिर पानी हो जाए


तब ये औंधी पड़ी नाव

सीधी होकर पूछेगी—

“क्या सफ़र अभी बाक़ी है?”


मुकेश ,,,,,,,,,,

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