बहती हुई नदी और इंतज़ार करता समंदर
बहती हुई नदी थी
पर्वतों की गोद से निकलकर
अपने ही सुर में गुनगुनाती हुई।
उसकी हर लहर में
एक बेचैनी थी,
जैसे किसी नाम की पुकार
पानी में घुली हो।
रास्ते उसे रोकते रहे
पत्थर, मोड़, किनारे,
मगर वो ठहरना नहीं जानती थी।
उधर समंदर था
वसीअ, ख़ामोश,
अपनी गहराइयों में सदियों का सब्र लिए।
वो जानता था,
हर नदी की तक़दीर
आख़िर उसी की बाँहों में लिखी है।
नदी भागती रही,
रेत पर अपने ख़त लिखती रही,
और हवा उन्हें पढ़कर मुस्कुराती रही।
समंदर ने कभी पुकारा नहीं,
बस अपनी लहरों को
दुआ की तरह फैलाए रखा।
जब वो मिली
तो कोई शोर नहीं हुआ,
बस पानी ने पानी को पहचान लिया।
नदी का सफ़र थमा नहीं,
बस उसका नाम बदल गया
और समंदर का इंतज़ार
एक मुकम्मल कहानी बन गया।
मुकेश ,,,,,,,
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