झुका हुआ आसमान और नाचती हुई धरती
झुका हुआ आसमान था,
जैसे किसी आशिक़ ने
अपना सर महबूब के दर पर रख दिया हो।
धरती नाच रही थी
पायल की हल्की झंकार में,
बारिश की पहली बूंदों के साथ।
हवा ने जब उसका आँचल छुआ,
तो बादलों ने शरमा कर
अपनी स्याही और गहरी कर ली।
फलक की पेशानी पर
शफ़क़ का गुलाबी बोसा था,
और ज़मीन के होंठों पर
इंतज़ार की मुस्कान।
ये कौन-सा रक़्स था
जिसमें कोई साज़ नहीं बजा,
मगर हर धड़कन
एक ग़ज़ल-सी लगने लगी।
आसमान झुकता गया,
धरती थिरकती गई,
और दरमियान की ख़ामोशी
इश्क़ की सबसे नर्म तफ़सीर बन गई।
उस शाम
ना कोई गवाह था,
ना कोई फ़ैसला
बस झुका हुआ आसमान था,
और नाचती हुई धरती,
जो एक-दूसरे में
बेआवाज़ ढल रहे थे।
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