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Wednesday, 18 February 2026

मेरे हाथ की लकीरें, जिसमें तुम कहीं नहीं हो

 मेरे हाथ की लकीरों में

कितनी बातें छुपी हैं

लेकिन तुम वहाँ नहीं हो।


हर मोड़ पर छुपी हैं कुछ ख़्वाहिशें,

कुछ ख़्वाब अधूरे,

कुछ यादें ख़ामोश,

जो कभी लफ़्ज़ों में नहीं आ सकीं।


मै इन लकीरों को देखता हूँ ,

तो लगता है जैसे किसी ने

चुपके से अपनी दास्ताँ छोड़ दी हो,

जो बस दिल की तहों में महकती रही।


लकीरों का यह बारीक- जाल 

मुझे बताता है कि वक़्त चलता रहा,

लोग आते रहे, जाते रहे,

लेकिन तुम वहाँ नहीं थे,

जहाँ मेरी आँखें तुम्हारी तलाश में रहें।


कुछ लकीरें हैं जो रंज़ से भीगी हुई हैं,

कुछ ख़ुशियों की सरगोशी सुनाती हैं,

और कुछ ख़ामोशियों की सदा

जो सिर्फ़ दिल के करीब होती है।


मेरे हाथ की लकीरों में

तुम नहीं हो,

लेकिन तुम्हारी यादें, तुम्हारी ख़ामोशी,

मेरी नसों और त्वचा की हर तह में बसी हैं।


और शायद यही सबसे बड़ी सच्चाई है,

कि कुछ लोग हमारी जिंदगी में इतने क़रीब होते हैं

कि उनकी ग़ैर-मौजूदगी भी

हमारे हाथ की लकीरों में छुपी होती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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