राख के बाद की रोशनी
(यमघण्ट एक प्रेमी का आर्तनाद )
जब अग्नि अपने अंतिम अक्षर तक जल चुकी,
और लकड़ियों की देह
धीरे-धीरे धूसर में बदल गई,
तब लगा—
सब कुछ समाप्त हो गया।
पर राख के भीतर
एक महीन-सी तपिश बची रही,
जैसे स्मृति का अंतिम स्पर्श
अभी भी पृथ्वी से चिपका हो।
पीपल की छाया लंबी थी उस शाम,
और हवा में धुएँ का स्वाद।
लोग लौट गए—
शोक को अपने-अपने घरों में बाँटते हुए।
पर श्मशान की निस्तब्धता में
कुछ शेष रह गया।
वह रोशनी थी
जो अग्नि से अलग हो चुकी थी,
पर अग्नि की नहीं रही।
दीप की लौ में
उसका सूक्ष्म अंश काँप रहा था।
जल की मटिया के पास
एक चमक उतर आई थी—
जैसे कोई अदृश्य उपस्थिति
अपने नए रूप में ठहर गई हो।
राख का स्वभाव है
धरती में मिल जाना;
रोशनी का स्वभाव है
आकाश की ओर उठना।
और मृत्यु—
इन दोनों के बीच का सेतु है।
मैंने देखा,
राख को उँगलियों से छूते ही
एक उजास भीतर उतर आया
न आँखों से दिखने वाला,
न शब्दों में बाँधने योग्य।
शायद यही आत्मा की चाल है
वह जलकर भी बुझती नहीं,
वह बिखरकर भी खोती नहीं।
वह रूप बदलती है,
जैसे संध्या रात में,
और रात किसी भोर में।
राख के बाद की रोशनी
किसी दीप में नहीं बसती,
वह स्मृति में घर करती है।
वह हर उस क्षण में चमकती है
जब कोई नाम अचानक
हृदय में उजाला कर दे।
लोग कहते हैं
“सब भस्म हो गया।”
पर मैं जानता हूँ—
भस्म होना अंत नहीं,
एक परिष्कार है।
राख में दबी हुई
वह अंतिम चिनगारी
समय पाकर
किसी नई आँख की चमक बनेगी,
किसी अनजान मुस्कान की रेखा,
या किसी और जीवन की पहली साँस।
और तब समझ आएगा
अग्नि ने जो लिया,
उससे अधिक लौटा दिया।
क्योंकि राख के बाद
जो रोशनी जन्म लेती है,
वह केवल प्रकाश नहीं—
वह प्रमाण है
कि परिवर्तन ही शाश्वत है,
और प्रेम—
अग्नि से भी अधिक दीर्घजीवी।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,
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