यमघंट : समय के कंठ पर टँगी ध्वनि
(एक शोधात्मक रहस्य-नज़्म)
शमशान की देहरी पर
जहाँ धुआँ आकाश से संवाद करता है,
वहीं कहीं अदृश्य-सा
एक यमघंट टँगा है—
न लोहे का, न पीतल का,
बल्कि समय के कंठ से ढला हुआ।
लोकमान्यता कहती है
जब किसी देह की अंतिम अग्नि शांत होती है,
एक सूक्ष्म ध्वनि उठती है,
जो कानों से नहीं,
कर्मों से सुनी जाती है।
उसी को शायद यमघंट कहते हैं।
यह घंटा किसी मंदिर में नहीं बजता,
न किसी हाथ से झूलता है;
यह तो जीवन के प्रत्येक क्षण में
धीरे-धीरे आकार लेता है
हर निर्णय एक परत,
हर इच्छा एक कंपन।
गरुड़ की छाया-सा
काल इसके ऊपर मँडराता है,
और जब नियति पूर्ण होती है,
तो एक अनसुना नाद
अंतरिक्ष में फैल जाता है।
शोध कहता है
ध्वनि कभी नष्ट नहीं होती;
वह तरंग बनकर
ब्रह्मांड में सुरक्षित रहती है।
तो क्या यह संभव है
कि यमघंट का नाद भी
किसी अदृश्य आकाश-गर्भ में
संचित रहता हो?
पीपल की पत्तियों में
जब बिना हवा के कंपन होता है,
या दीप की लौ
अचानक लंबी होकर काँप उठती है—
क्या वह उसी नाद का प्रतिध्वनन है?
यमघंट भय का प्रतीक नहीं;
वह स्मरण का संकेत है
कि हर श्वास
एक गिनती में जुड़ रही है।
उसकी ध्वनि
न्याय भी है,
मुक्ति भी।
कभी वह कठोर लगती है
जैसे समय का आदेश;
कभी करुण—
जैसे थकी हुई आत्मा को विश्राम का निमंत्रण।
मैं सोचता हूँ—
क्या वह घंटा बाहर बजता है,
या भीतर?
जब हृदय अचानक
किसी अकारण पीड़ा से भर उठता है,
जब रात के तीसरे पहर
एक अज्ञात बेचैनी जगती है
क्या वह उसी यमघंट की
पूर्व-ध्वनि है?
लोक-विश्वास इसे यम का आह्वान मानता है;
पर शोध कहता है—
यह तो चेतना का रूपांतरण है,
जहाँ देह का अध्याय पूर्ण होता है
और रूह का नया पृष्ठ खुलता है।
यमघंट की ध्वनि
विनाश का उद्घोष नहीं,
संक्रमण का मंत्र है।
वह कहती है
“जो जन्मा है, वह बदलेगा;
जो बदलेगा, वह फिर जन्म लेगा।”
और इस प्रकार
हर मृत्यु
एक ध्वनि बनकर
अनंत में घुल जाती है
यमघंट के नाद की तरह—
धीमी,
पर शाश्वत।
मुकेश ,,,,,,,,
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