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Tuesday, 24 February 2026

मटिया में जल, स्मृति में अग्नि

 मटिया में जल, स्मृति में अग्नि

(पीपल पे बंधे यमघण्ट - एक प्रेमी का आर्तनाद )


पीपल के तने से बँधी दो मटियाएँ—

एक में जल,

दूसरी में काँपती हुई लौ।

धरती और आकाश के बीच

टँगा हुआ यह छोटा-सा ब्रह्मांड

शोक की भाषा में बोलता है।


जल स्थिर दिखता है,

पर उसकी गहराई में

चेहरों की परछाइयाँ उतरती-उतराती रहती हैं।

कभी लगता है

जैसे कोई अदृश्य होंठ

उसकी सतह को छूकर गुज़रे हों।


और उस दूसरी मटिया में

अग्नि—

धीमी, पर अडिग।

वह राख की स्मृति से जन्मी है,

और राख में ही

अपना अर्थ खोजती है।


कहते हैं,

जल तृष्णा के लिए है,

अग्नि प्रकाश के लिए।

पर मैं जानता हूँ—

जल देह की प्यास बुझाता है,

अग्नि स्मृति की।


जब हवा चलती है,

दीप काँपता है—

जैसे कोई नाम भीतर से पुकारा गया हो।

और जल में उठती है एक लहर,

मानो उत्तर में कोई स्वीकृति दी गई हो।


यह केवल लोक-रीति नहीं,

यह जीवन और मृत्यु का संवाद है।

एक मटिया कहती है—

“जो गया, वह लौटे तो तृप्त हो।”

दूसरी कहती है—

“जो शेष हैं, वे अंधेरे में न खो जाएँ।”


रात के तीसरे पहर

जब सब ध्वनियाँ थम जाती हैं,

मैं देखता हूँ—

अग्नि लंबी होकर

जैसे अतीत को छूना चाहती हो,

और जल की सतह पर

किसी स्मृति की परत चमकती है।


मटिया में जल है—

पर स्मृति में अग्नि।

वह अग्नि जो बुझती नहीं,

केवल रूप बदलती है।


वही अग्नि

कभी प्रेम बनकर धधकती है,

कभी विरह बनकर सुलगती है,

और कभी प्रार्थना बनकर

आँखों में आ जाती है।


पीपल की जड़ों में

राख मिली हुई है,

शाख़ों में हवा गाती है—

और इन दोनों के बीच

जल और अग्नि

एक संतुलन साधे खड़े हैं।


शायद यही जीवन का रहस्य है—

तृष्णा और तप,

शीतलता और दाह,

विरह और आलोक।


जब तक मटिया में जल है

और स्मृति में अग्नि,

तब तक मृत्यु

अंत नहीं,

एक रूपांतरण है—

जहाँ प्यास भी पवित्र है

और दाह भी दीप बन जाता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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