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Tuesday, 24 February 2026

पत्तों की फुसफुसाहट में लौटती आवाज़

 पत्तों की फुसफुसाहट में लौटती आवाज़

(पीपल पे बंधे यमघण्ट - एक प्रेमी का आर्तनाद )


रात की देह पर

जब चाँद अपनी धुँधली रेखा खींचता है,

पीपल की शाख़ें

एक गुप्त लिपि में काँपने लगती हैं।


कोई हवा नहीं चलती,

फिर भी पत्ते बोलते हैं—

धीरे, बहुत धीरे—

जैसे किसी गर्भित रहस्य की साँस।


मैं सुनता हूँ।

और सुनते हुए

अपने भीतर उतरता जाता हूँ।


वह आवाज़

जो कभी इस देह के पास बैठती थी,

आज वृक्ष की ऊँचाइयों से उतरती है—

टूटी हुई नहीं,

पर बदली हुई।


कहते हैं,

रूहें विलीन नहीं होतीं,

वे रूप बदलती हैं—

जैसे जल

बादल बनकर लौटे,

और बादल

वर्षा होकर फिर धरती को छुए।


शायद वही चक्र

इन पत्तों में धड़कता है।


हर फुसफुसाहट

एक बीज है—

जिसमें कोई पुरानी स्मृति

नए शरीर की तलाश में है।


कभी लगता है

यह सिर्फ़ विरह की प्रतिध्वनि है;

पर कभी—

एक अनजाना शिशु

कहीं दूर जन्म लेता होगा

उसी क्षण

जब पत्ते एक साथ काँप उठते हैं।


दीप की लौ अचानक लंबी हो जाती है,

जैसे किसी अदृश्य श्वास ने

उसे छुआ हो।

जल की मटिया में

सूक्ष्म-सी लहर उठती है—

और मैं समझ जाता हूँ

कि यह सिर्फ़ स्मरण नहीं,

संकेत है।


पुनर्जन्म

किसी शोर में नहीं आता—

वह इसी तरह लौटता है,

एक हल्की ध्वनि बनकर,

जो पहले वृक्ष में बसती है,

फिर वायु में,

फिर किसी शिशु की पहली रोने की धुन में।


क्या पता—

जो आवाज़ आज पत्तों में है,

वह कल किसी आँख की चमक हो,

किसी अनजान मुस्कान की रेखा,

या किसी अपरिचित स्वर का कंपन।


मैं तने से पीठ टिकाकर

आकाश को देखता हूँ।

तारे स्थिर हैं,

पर भीतर एक चक्र घूमता है—

जन्म, मृत्यु, और फिर जन्म।


पत्तों की फुसफुसाहट

अब भय नहीं जगाती;

वह आश्वस्त करती है—

कि जो गया,

वह शून्य नहीं हुआ।


वह लौटेगा—

किसी नए नाम में,

किसी नए स्पर्श में,

पर पहचान वही होगी—

जो आज इन पत्तों की रहस्यमयी भाषा में

मुझसे बात कर रही है।


और मैं प्रतीक्षा करूँगा—

उस क्षण की

जब यह आवाज़

फिर से देह धारण करेगी,

और मैं कह सकूँगा—

“मैंने तुम्हें पहले भी सुना है…

पीपल की फुसफुसाहट में।”


मुकेश ,,,,,,,,,

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