डायरी का एक पन्ना — वह मुझे जानती थी
वो मेरे बदन के सारे तिल और मस्से जानती थी,
जैसे किसी ने
नक्शे पर छोटे-छोटे सितारे चिन्हित कर दिए हों।
उसे मालूम था
मेरे कंधे के पास वह छोटा सा निशान,
और गर्दन के पीछे का वह हल्का सा तिल
जिसे मैं आईने में भी ठीक से नहीं देख पाता था।
पर बात सिर्फ़ बदन की नहीं थी
वो मेरी आवाज़ के कंपन को भी पहचानती थी,
जब मैं मज़बूत बनने की कोशिश करता था।
उसे पता था
कब मैं थका हुआ हूँ,
कब मुस्कान बनावटी है,
और कब मेरी चुप्पी
शोर मचा रही है।
वो जानती थी
मेरे भीतर के डर,
मेरे अधूरे सपने,
और वो कोना
जहाँ मैं किसी को आने नहीं देता था।
उसकी उँगलियाँ
सिर्फ़ त्वचा को नहीं,
मेरे आत्मविश्वास और असुरक्षाओं को भी छू लेती थीं।
आज जब वह साथ नहीं है,
आईना वही है,
तिल और मस्से भी वही हैं
पर उन्हें पहचानने वाली नज़र
अब पास नहीं।
और शायद
किसी को पूरी तरह जानना
सिर्फ़ शरीर को देख लेना नहीं,
बल्कि उसकी खामोशियों को पढ़ लेना है।
मुकेश ,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment