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Monday, 23 February 2026

आँगन का रेडियो चुप है

 आँगन का रेडियो चुप है

लकड़ी की पेटी में बंद

एक बीता हुआ ज़माना

धूल की महीन परत ओढ़े पड़ा है।


कभी उसी से

सुबह की ख़बरें उतरती थीं,

दोपहर की फ़रमाइशें,

और शाम की गूँजती हुई धुनें।


उसके गोल डायल पर

उँगलियाँ शहर खोजती थीं

लखनऊ, दिल्ली, बंबई…

जैसे हवा में रास्ते खुल रहे हों।


आँगन में दादी खाट पर,

बच्चे ज़मीन पर,

और पड़ोसी दीवार के उस पार—

सबकी सुनवाई एक ही तरंग पर।


वो सिर्फ़ यंत्र नहीं था,

सामूहिक श्रवण का संस्कार था

जहाँ आवाज़ निजी नहीं,

साझी होती थी।


जब गाने बजते,

तो चूल्हे की आँच भी

ताल में जलती थी।

जब समाचार आते,

तो देश घर के भीतर आ बैठता था।


फिर समय बदला

टेलीविज़न ने दृश्य जोड़े,

मोबाइल ने आवाज़ को

व्यक्तिगत कर दिया।


अब हर कान में

अलग-अलग दुनिया है,

और आँगन

बातचीत से अधिक

वाई-फ़ाई का क्षेत्र बन गया है।


रेडियो चुप है

पर उसकी जाली में

अब भी फँसी है

पुरानी तरंगों की गूँज।


शोध की दृष्टि से देखें

तो वह उपकरण

घरेलू लोकतंत्र था

जहाँ सूचना, संगीत और राष्ट्र

एक साथ सुनाई देते थे।


आँगन का रेडियो चुप है,

पर कभी-कभी हवा चलती है

तो लगता है

कोई पुरानी धुन

फिर से ट्यून हो रही है।


मुकेश ,,,,,,,,,

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