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Monday, 23 February 2026

तुम और फ़ागुन की आहट

 तुम और फ़ागुन की आहट 

दोनों ही हल्की, दोनों ही खिलती हुई,

जैसे कोई हवा में गीत बुन रही हो।


फ़ागुन की हवा जब सरसराती है,

तुम्हारे कदमों की आहट लगती है।

और मैं बस सुनता रहता हूँ,

हर झोंके में तुम्हारे होने की मौजूदगी खोजते हुए।


तुम हँसती हो,

जैसे पेड़ों की शाखाओं पर फूल खिलते हैं,

और हर हँसी की बूँद

मेरे दिल के पत्तों पर गिरती है।


तुम चलते हो, फ़ागुन के रास्तों में,

और धूप की हल्की गर्माहट

तुम्हारे बालों के साथ खेलती है।

हर कदम, हर सांस

जैसे समय की धीमी लय में घुल गया हो।


मैं पीछे चलता हूँ,

मौन में, चुपचाप,

बस आहट से तुम्हारे पास पहुँचने की कोशिश करता हूँ।

कभी फ़ागुन की खुशबू

तुम्हारी याद में घुल जाती है,

और मैं महसूस करता हूँ —

तुम हमेशा यहीं हो,

हर हवा में, हर धड़कन में।


रात आती है,

और फ़ागुन की ठंडी हवा

हमारे चारों ओर घूमती है।

तुम मेरी ओर देखती हो,

और मैं तुम्हें देखता हूँ,

जैसे पूरी दुनिया बस एक सांस के लिए ठहर गई हो।


तुम और फ़ागुन की आहट 

दोनों ही प्रेम की आवाज़ हैं,

मौन में, हलके में,

जैसे कोई रहस्य सिर्फ़ हमारी रूह के लिए बना हो।


कवि टिप्पणी:

यह नज़्म “तुम और फ़ागुन की आहट” के माध्यम से

रूहानी प्रेम, मौसम की कोमलता, और मौन संवाद को दर्शाती है।

जहाँ आहट केवल आवाज़ नहीं 

यह उपस्थिति, स्मृति, और अनकही चाहत की भाषा बन जाती है।


मुकेश ,,,,,,,,,

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