तुम और डहलिया के फूल
दोनों ही धीरे-धीरे खिलते हैं,
एक दूसरे को नज़रअंदाज़ किए बिना,
पर अपनी खुशबू हवा में फैलाते हुए।
तुम्हारी हँसी,
जैसे सुबह की हल्की धूप,
और डहलिया के फूल की पंखुड़ियाँ,
जैसे सूर्य के साथ झूमती हैं।
तुम बैठती हो पास
और मैं देखता रहता हूँ,
हर हरकत में तुम्हारी नाज़ुकता,
जैसे फूल की पंखुड़ी की रेशमी चमक।
और फिर मैं सोचता हूँ
कितनी अजीब दुनिया है,
जहाँ फूल खिलते हैं और तुम मुस्कुराते हो,
दोनों ही बिना शब्द कहे,
दुनिया में अपनी जगह बना लेते हैं।
तुम्हारी ख़ामोशी में
डहलिया की कोमलता घुल जाती है,
और मेरी नज़रें
फूलों और तुम्हारे बीच
अनकहा रिश्ता खोजती हैं।
रात आते-आते,
जब हवा ठंडी हो जाती है,
और फूल अपने सिर झुका लेते हैं,
तुम्हारा हाथ भी मेरे हाथ में
धीरे से अपना स्थान ले लेता है।
तुम और डहलिया के फूल
दोनों ही कुछ पल के लिए जीवित होते हैं,
और फिर भी हमेशा याद रहते हैं।
जैसे कोई छोटा-सा रहस्य,
जो सिर्फ़ तुम्हारे और मेरे बीच है।
कवि टिप्पणी:
यह नज़्म “तुम और डहलिया के फूल” के माध्यम से
सादगी, संवेदनशील प्रेम और प्रकृति की अनकही भाषा को दर्शाती है।
जहाँ फूल सिर्फ़ फूल नहीं,
और तुम सिर्फ़ तुम नहीं —
बल्कि प्रेम की उस मौन सुंदरता के प्रतीक हो।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,
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