वो थकान जो सोकर भी नहीं जाती
वो थकान
जिसे नींद छू नहीं पाती,
हर सुबह मुझे फिर से मिलती है
जैसे कोई पुरानी याद
बिना पूछे कमरे में प्रवेश कर जाए।
रात के सन्नाटे में भी
उसकी भारी साँसें मेरे सिरहाने रहती हैं,
और दिन की हलचल
उसे छिपा नहीं पाती।
कभी लगता है
ये थकान सिर्फ़ शरीर की नहीं,
ये मन की है,
जो टूटे हुए ख्वाबों के बोझ तले दबा है।
और मैं फिर भी उठता हूँ,
दूसरे चेहरे, दूसरे शब्दों के पीछे दौड़ता हूँ,
लेकिन वो थकान
मेरे साथ चलती रहती है—
कदम दर कदम, साँस दर साँस।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment