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Sunday, 22 February 2026

एक आवारा जब अपने शहर को देखता है,,

 एक आवारा जब अपने शहर को देखता है,,

चल पड़ा हूँ धुएँ के साये में, चुपचाप सिगरेट सुलगाता,

ये शहर भी अब मुझे देख के मुँह फेर लेता है, मुस्काता।

कल जो मेरी साँसों की दस्तक पर हर शाम दीवाना था,

आज वही चेहरा मेरे अश्कों से दामन बचाता।

हर मोड़ पर इक साया मिला, जो मुझको मुझसे चुराता था,

ज़ख्मों की स्याही से कोई फिर मेरा नाम लिख जाता।

चौराहों पर खड़ा वक़्त भी अब मुझसे कतराने लगा है,

मैं जो भी किस्सा शुरू करूँ, कोई और उसे दोहराता।

हाथ में छाले, जेबें ख़ाली, और निगाहें बुझी-बुझी सी,

हर गली, हर मोड़ मुझे मेरा ग़म ही ग़ज़ल में सुनाता।

वो जो कहता था "तू ही तू है", आज उसी की जुबां पर मैं,

अजनबी सा एक नाम हूँ, जो किसी को अब ना भाता।

कभी ख़्वाबों में जो था शामिल, आज हकीकत से दूर बहुत,

वो मेरा अपना सा कल भी अब मुझसे नज़र चुराता।

मुक़द्दर से शिकवा क्या करूँमुकेश’, जब ख़ुद पे ही शक है,

ये आईना भी अब मुझको, मेरा चेहरा नहीं दिखाता।

मुकेश इलाहाबादी ----------------

 

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